घर में गणपति बप्पा दस दिन रहने के बाद जिस दिन विदाई की तैयारी शुरू होती है, ठीक उसी दिन एक और पूजा भी घर-घर में हो रही होती है जिसका जिक्र कम होता है।
हाथ पर चौदह गांठों वाला एक धागा बांधा जाता है, और यही सवाल हर साल दोहराया जाता है कि आखिर अनंत चतुर्दशी कब है और यह गणेश विसर्जन से अलग क्यों है।
इस लेख में इसी उलझन को सीधे और स्पष्ट तरीके से सुलझाने की कोशिश की गई है।
अगर आप सिर्फ तारीख जानने आए हैं तो सीधा जवाब यह है — 2026 में अनंत चतुर्दशी शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को है। यह भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि पर पड़ती है।
लेकिन तारीख से आगे बढ़कर यह समझना भी जरूरी है कि यह व्रत असल में किसकी पूजा के लिए है, गणेश विसर्जन से इसका क्या संबंध है, और घर पर इसे सही तरीके से कैसे किया जाए।
अनंत चतुर्दशी 2026 की तारीख और तिथि
कई पंचांग वेबसाइट पर 2026 के लिए तारीख को लेकर हल्का भ्रम देखने को मिलता है, इसलिए यहां कई स्रोतों से मिलान करके ही तारीख दी जा रही है। drikpanchang.com, astrosage.com और विकिपीडिया — तीनों पर एक जैसी तारीख दर्ज है।
विवरण | जानकारी |
|---|---|
दिन और तारीख | शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 |
हिंदू माह | भाद्रपद |
पक्ष | शुक्ल पक्ष |
तिथि | चतुर्दशी |
मुख्य पूजा | भगवान विष्णु का अनंत रूप |
साथ में मनाया जाने वाला पर्व | गणेश विसर्जन (10वां दिन) |
चतुर्दशी तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय हर शहर में सूर्योदय के हिसाब से थोड़ा बदल सकता है।
नई दिल्ली के लिए कई पंचांग स्रोत बताते हैं कि चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर 2026 की रात करीब 11:18 बजे शुरू होकर 25 सितंबर 2026 की रात करीब 11:06 बजे समाप्त होती है।
इसी कारण व्रत 25 सितंबर को रखा जाता है, न कि 24 को, क्योंकि सूर्योदय के समय जो तिथि विद्यमान रहती है, उसी दिन को व्रत का दिन माना जाता है।
अपने शहर का सटीक समय जानने के लिए स्थानीय पंचांग जरूर देखें, क्योंकि समय में कुछ मिनट का अंतर सामान्य बात है।
पूजा का शुभ मुहूर्त
अनंत चतुर्दशी की पूजा दिन के पहले भाग में करना शुभ माना जाता है। परंपरा के अनुसार यह पूजा सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले करने की सलाह दी जाती है। यदि सुबह समय न मिले तो मध्याह्न के शुरुआती हिस्से में भी पूजा की जा सकती है।
अनंत चतुर्दशी असल में किसकी पूजा है
यह समझना जरूरी है कि इस दिन दो अलग-अलग परंपराएं एक ही तिथि पर आ जाती हैं, और दोनों को मिला देना ही असल भ्रम की जड़ है।
पहली परंपरा भगवान विष्णु से जुड़ी है। इस दिन विष्णु जी की पूजा उनके अनंत रूप में की जाती है, जिसमें वे शेषनाग पर विराजमान माने जाते हैं।
इसे अनंत व्रत या अनंत पद्मनाभ व्रत कहा जाता है, और यही इस तिथि का मूल नाम भी है।
दूसरी परंपरा गणेश उत्सव से जुड़ी है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से शुरू हुआ दस दिन का गणेशोत्सव इसी चतुर्दशी तिथि पर पूरा होता है, और इसी दिन गणपति बप्पा का विसर्जन किया जाता है। इसीलिए इस तिथि को कहीं-कहीं गणेश चौदस भी कहा जाता है।
एक बात साफ समझ लें — विष्णु जी की अनंत पूजा और गणेश विसर्जन, दोनों का आपस में कोई पौराणिक कथा-संबंध नहीं है। ये सिर्फ एक ही तिथि पर आ जाते हैं।
महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में गणेश विसर्जन का पहलू ज्यादा प्रमुख दिखता है, जबकि उत्तर भारत, बिहार और नेपाल के कई हिस्सों में अनंत सूत्र वाली विष्णु पूजा घरों में ज्यादा प्रचलित है।
यह अंतर क्षेत्रीय परंपरा का है, इसे सार्वभौमिक नियम मानकर नहीं देखना चाहिए।
अनंत सूत्र और चौदह गांठों का अर्थ
अनंत चतुर्दशी की पहचान ही उस धागे से होती है जिसे अनंत सूत्र कहते हैं। यह सूती या रेशमी धागा होता है, जिसमें चौदह गांठें बांधी जाती हैं, और इसे विष्णु जी की पूजा के बाद हाथ में बांधा जाता है।
परंपरा के अनुसार पुरुष इसे दाहिने हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में बांधती हैं, हालांकि परिवार और क्षेत्र के अनुसार इसमें अंतर भी देखा जाता है।
चौदह गांठों को लेकर मान्यता यह है कि ये चौदह लोकों का प्रतीक हैं — सात ऊपरी लोक और सात निचले लोक, जो हिंदू पौराणिक ब्रह्मांड-रचना की एक पारंपरिक अवधारणा है।
यह एक धार्मिक-सांकेतिक मान्यता है, न कि कोई वैज्ञानिक तथ्य, इसलिए इसे उसी नजरिए से समझना उचित रहेगा।
घर पर पूजा विधि — चरण दर चरण
पूजा को सरल रखा जा सकता है, इसके लिए बड़े आयोजन या पंडित की जरूरत हर बार नहीं पड़ती। नीचे एक सामान्य क्रम दिया गया है, जिसे परिवार अपनी परंपरा के अनुसार थोड़ा बदल भी सकते हैं।
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें, संभव हो तो पीला वस्त्र प्राथमिकता दें क्योंकि यह विष्णु जी को प्रिय माना जाता है।
पूजा स्थान को साफ करें और वहां विष्णु जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर उस पर कलश, नारियल और फूल सजाएं।
अनंत सूत्र में चौदह गांठें पहले से बांध लें और इसे हल्दी-कुमकुम मिले जल में डुबाकर रखें।
संकल्प लें, यानी मन में व्रत का उद्देश्य स्पष्ट करें और भगवान अनंत का आवाहन करें।
जल, चंदन, अक्षत, फूल और तुलसी पत्र चढ़ाकर विष्णु जी की पूजा करें।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
पूजा के अंत में अनंत सूत्र को विधिपूर्वक हाथ पर बांधें।
आरती करें और परिवार में प्रसाद बांटें।
व्रत रखने वाले लोग अक्सर दिन में फलाहार करते हैं और शाम की पूजा के बाद सात्विक भोजन करते हैं, लेकिन यह भी परिवार की परंपरा और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।
पूरे दिन का निर्जल व्रत सभी के लिए जरूरी नहीं है, खासकर बुजुर्गों और स्वास्थ्य समस्या वाले लोगों को अपनी सुविधा के अनुसार ही व्रत तय करना चाहिए।
व्रत कथा — कौंडिन्य और सुशीला की कथा
अनंत चतुर्दशी के व्रत के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी है, जिसे पूजा के दौरान सुनाया जाता है। कथा के अनुसार सुशीला नाम की एक स्त्री ने नदी तट पर कुछ महिलाओं को अनंत भगवान की पूजा करते और सूत्र बांधते देखा।
उनसे इस व्रत का महत्व जानकर सुशीला ने भी श्रद्धा से यह व्रत किया और सूत्र बांधा।
बाद में उनके पति कौंडिन्य ने अनजाने में उस सूत्र का अनादर कर दिया, जिसके बाद कथा में उनके जीवन में कठिनाइयां आने का वर्णन मिलता है।
पश्चाताप के बाद कौंडिन्य ने अनंत भगवान की आराधना की और व्रत को श्रद्धा से पूरा किया, जिससे उनका सुख-समृद्धि फिर से लौट आई।
एक और प्रचलित कथा महाभारत से जुड़ी बताई जाती है, जिसमें कहा जाता है कि जब पांडव वनवास में कष्ट झेल रहे थे, तब भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को यह व्रत करने की सलाह दी थी।
यह कहानी सदियों से मुख से मुख तक पहुंची पौराणिक परंपरा का हिस्सा है, इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं बल्कि धार्मिक आस्था और शिक्षा की कथा के रूप में समझना ज्यादा उचित रहेगा।
क्षेत्रीय परंपराओं में अंतर
भारत विविधताओं का देश है, और यही विविधता अनंत चतुर्दशी के मनाने के तरीके में भी साफ दिखती है। नीचे दी गई जानकारी सामान्य प्रवृत्ति दर्शाती है, हर परिवार या समुदाय में इससे अंतर हो सकता है।
क्षेत्र | प्रमुख रूप से जोर | विशेष बात |
|---|---|---|
महाराष्ट्र | गणेश विसर्जन | लालबागचा राजा जैसे बड़े विसर्जन जुलूस |
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना | विष्णु अनंत पूजा और विसर्जन दोनों | पद्मनाभस्वामी रूप की पूजा प्रमुख |
कर्नाटक | अनंत पद्मनाभ व्रत | घर-घर में सूत्र बांधने की परंपरा मजबूत |
उत्तर भारत, बिहार, नेपाल | विष्णु अनंत पूजा, कम सार्वजनिक विसर्जन | घर पर सादगी से पूजा अधिक प्रचलित |
यह वर्गीकरण सामान्य पर्यवेक्षण पर आधारित है, कोई सख्त नियम नहीं। किसी भी क्षेत्र में परिवार अपनी पुरानी परंपरा के अनुसार ही व्रत और पूजा तय करते हैं।
अनंत सूत्र से जुड़ी सावधानियां
पूजा को श्रद्धा और सही तरीके से करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना पारंपरिक रूप से उचित माना जाता है।
पूजा के दौरान मन शांत और स्थान स्वच्छ रखें।
अनंत सूत्र में चौदह गांठें बांधने की परंपरा का पालन करें, संख्या को लेकर लापरवाही न करें।
व्रत को केवल रूढ़िवादी क्रिया न मानें, इसे श्रद्धा और समझ के साथ करें।
सूत्र बांधने के बाद उसका अनादर न करें, इसे सम्मान के साथ धारण करें।
स्वास्थ्य कारणों से पूरा उपवास संभव न हो तो फलाहार या सामान्य सात्विक भोजन का विकल्प चुनें।
छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर व्रत के लिए दबाव न डालें, यह पूरी तरह व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय है।
गणेश विसर्जन के साथ पूजा की व्यावहारिक योजना
जिन घरों में गणपति बप्पा दस दिन के लिए आते हैं, वहां इस दिन दोहरी तैयारी रहती है — सुबह विष्णु जी की अनंत पूजा और फिर दिन में गणेश विसर्जन की तैयारी।
व्यावहारिक तौर पर सुबह के मुहूर्त में अनंत पूजा निपटाकर दिन में विसर्जन की योजना बनाना ज्यादा सुविधाजनक रहता है, क्योंकि विसर्जन जुलूस में अक्सर समय और भीड़ दोनों ज्यादा लगते हैं।
पर्यावरण की दृष्टि से मिट्टी की मूर्ति और घर पर ही बाल्टी या टब में विसर्जन का चलन अब शहरों में तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि नदी और समुद्र में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के विसर्जन से जल-प्रदूषण की समस्या सामने आती रही है।
यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी एक व्यावहारिक सलाह है, न कि धार्मिक अनिवार्यता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
2026 में अनंत चतुर्दशी किस दिन है?
2026 में अनंत चतुर्दशी शुक्रवार, 25 सितंबर को है। यह भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर पड़ती है और अलग-अलग पंचांग स्रोतों में यह तारीख एक समान दर्ज है।
अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन एक ही दिन क्यों होते हैं?
दोनों की तिथि एक जैसी है, लेकिन वजह अलग-अलग है। गणेश उत्सव चतुर्थी से शुरू होकर दस दिन बाद इसी चतुर्दशी पर पूरा होता है, जबकि विष्णु जी का अनंत व्रत अपनी अलग परंपरा और कथा के साथ इस तिथि से स्वतंत्र रूप से जुड़ा है। यह एक कैलेंडर संयोग है, कोई साझा पौराणिक मूल नहीं।
अनंत सूत्र किस हाथ में बांधना चाहिए?
सामान्य परंपरा में पुरुष दाहिने हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में सूत्र बांधती हैं, लेकिन परिवार की पुरानी परंपरा भी इसमें अंतिम निर्णय होती है। किसी विशेष असमंजस की स्थिति में अपने परिवार के बड़े सदस्य या पुरोहित से सलाह लेना बेहतर रहेगा।
अगर सूत्र गलती से टूट जाए तो क्या करें?
पारंपरिक मान्यता में सूत्र का टूटना अपशगुन नहीं बल्कि सामान्य घटना माना जाता है। कई लोग इसे श्रद्धा से हटाकर पवित्र स्थान पर रख देते हैं। इसे लेकर अत्यधिक चिंता करने की जरूरत नहीं है, यह धार्मिक भावना का विषय है, नियम नहीं।
क्या यह व्रत बिना पंडित के घर पर किया जा सकता है?
हां, यह व्रत सरल है और अधिकांश परिवार इसे बिना पुरोहित के भी श्रद्धा और सही विधि की समझ के साथ घर पर कर लेते हैं। कठिन संस्कृत मंत्रों के स्थान पर सरल हिंदी में भी संकल्प और प्रार्थना की जा सकती है।
अनंत चतुर्दशी पर व्रत रखना जरूरी है या केवल पूजा करना पर्याप्त है?
व्रत रखना पूरी तरह व्यक्तिगत श्रद्धा और स्वास्थ्य क्षमता पर निर्भर करता है। बहुत से लोग केवल पूजा और सूत्र बंधन करते हैं, बिना कठोर उपवास के, और यह भी परंपरा में पूरी तरह मान्य है।
संक्षेप में
अनंत चतुर्दशी 2026 में 25 सितंबर, शुक्रवार को पड़ रही है। यह दिन एक साथ दो परंपराओं को समेटे रखता है — विष्णु जी के अनंत रूप की पूजा और गणपति बप्पा की विदाई। दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है, ताकि पूजा-विधि में भ्रम न हो और श्रद्धा सही दिशा में जाए।
अनंत सूत्र की चौदह गांठें एक पुरानी धार्मिक मान्यता का प्रतीक हैं, इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आस्था और परंपरा के रूप में देखना उचित रहेगा।
सही तिथि और मुहूर्त की पुष्टि के लिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग जरूर देख लें, क्योंकि समय में शहर-दर-शहर थोड़ा अंतर आ सकता है।
सूत्र और संदर्भ: तिथि और मुहूर्त की जानकारी drikpanchang.com और astrosage.com के पंचांग डेटा से मिलान करके ली गई है। पौराणिक संदर्भ और सामान्य जानकारी के लिए Ananta Chaturdashi — Wikipedia देखा जा सकता है। किसी भी विशेष शहर के लिए सटीक चतुर्दशी तिथि समय और चौघड़िया मुहूर्त हमेशा नवीनतम स्थानीय पंचांग से पुष्टि करके ही तय करें, क्योंकि पंचांग गणना समय और स्थान के अनुसार बदलती है।
लेखक और संपादकीय जानकारी: यह लेख choghadiyas.in की संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध पंचांग स्रोतों की जांच के बाद तैयार किया गया है। धार्मिक और पौराणिक जानकारी को परंपरा और आस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि वैज्ञानिक या ऐतिहासिक तथ्य के रूप में। लेख में किसी भी सुधार या स्थानीय भिन्नता की जानकारी के लिए पाठक टिप्पणी के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।
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