Sankashti Chaturthi Vrat Vidhi संकष्टी चतुर्थी व्रत कैसे रखें? चंद्रोदय समय, कथा और पारण का सही तरीका

Sankashti Chaturthi Vrat Vidhi संकष्टी चतुर्थी व्रत कैसे रखें? चंद्रोदय समय, कथा और पारण का सही तरीका
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हर महीने जब संकष्टी चतुर्थी आती है, तो सबसे ज्यादा सवाल एक ही होता है — "आज चांद कितने बजे दिखेगा और व्रत कब खोलूं?" यही वो उलझन है जो नए और पुराने व्रती दोनों को परेशान करती है।

कभी बादल छाए होते हैं, कभी शहर बदलने से समय बदल जाता है, और कभी घर के बड़े-बुजुर्ग एक समय बताते हैं तो मोबाइल ऐप कोई दूसरा समय दिखा देता है।

इस लेख को लिखने से पहले मैंने अलग-अलग पंचांग स्रोतों की तुलना करके देखी — जैसे किसी एक शहर का चंद्रोदय समय अलग-अलग वेबसाइट पर 5 से 10 मिनट तक अलग दिख सकता है।

यह फर्क कोई गलती नहीं है, बल्कि हर पंचांग की गणना पद्धति में थोड़ा अंतर होने की वजह से आता है। इसी वजह से इस लेख में सिर्फ अनुमानित समय दिया गया है, ताकि आप अपने शहर का सटीक समय खुद वेरिफाई कर सकें।

बात करने से पहले एक जरूरी बिंदु — 29 सितंबर 2026, मंगलवार को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी है, और मंगलवार होने के कारण इसे अंगारकी संकष्टी भी कहा जाता है। अगर आप यह लेख उसी हफ्ते पढ़ रहे हैं, तो नीचे दी गई विधि और समय-सारणी सीधे आपके काम आएगी।

संकष्टी चतुर्थी होती क्या है, सीधी भाषा में समझें

हिंदू पंचांग में हर महीने दो चतुर्थी तिथि आती है। पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में जो चतुर्थी आती है, उसे संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, और अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी या वैनायकी चतुर्थी कहा जाता है।

"संकष्टी" शब्द संस्कृत के "संकष्ट" से बना माना जाता है, जिसका मतलब कठिनाई या संकट से जुड़ा होता है।

पारंपरिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है और इसे जीवन की बाधाओं को कम करने के उद्देश्य से रखा जाता है। यह एक आस्था और परंपरा से जुड़ी बात है, इसे वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उत्तर भारत के कई राज्यों में माघ महीने की संकष्टी चतुर्थी को "सकट चौथ" या "तिलकुट चौथ" के नाम से भी जाना जाता है, और वहां इसे मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की भलाई के लिए रखती हैं। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसे साल भर एक जैसे महत्व के साथ मनाया जाता है।

संकष्टी और विनायक चतुर्थी में फर्क कन्फ्यूजन यहीं से शुरू होता है

बहुत से लोग दोनों चतुर्थी को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों का पक्ष, समय और परंपरा अलग होती है। नीचे की टेबल में यह फर्क साफ तरीके से समझाया गया है।

संकष्टी और विनायक चतुर्थी में फर्क कन्फ्यूजन यहीं से शुरू होता है

बिंदु

संकष्टी चतुर्थी

विनायक (वैनायकी) चतुर्थी

पक्ष

कृष्ण पक्ष (घटता चंद्रमा)

शुक्ल पक्ष (बढ़ता चंद्रमा)

व्रत खोलने का समय

रात में चंद्र दर्शन के बाद

दिन में सूर्यास्त के बाद, चांद देखे बिना भी

मुख्य आराध्य

भगवान गणेश (विघ्नहर्ता स्वरूप)

भगवान गणेश (सिद्धिविनायक स्वरूप)

लोकप्रियता

पूरे भारत में मासिक व्रत के रूप में

कुछ क्षेत्रों में अधिक प्रचलित

विशेष नाम

मंगलवार को अंगारकी संकष्टी


व्रत शुरू करने से पहले ध्यान रखने वाली बातें

व्रत रखने का फैसला लेने से पहले अपनी सेहत और परिस्थिति को समझना जरूरी है। हर व्यक्ति के लिए एक जैसा कठोर नियम लागू नहीं होता, और यह बात खुद पंचांग की जानकारी रखने वाली कई वेबसाइटें भी मानती हैं।

  • गर्भवती महिलाएं फलाहार (फल-दूध वाला हल्का व्रत) रख सकती हैं, निर्जला व्रत की जिद न करें।

  • बीमार, दवा पर चल रहे या बुजुर्ग व्यक्ति डॉक्टर की सलाह के हिसाब से व्रत का स्वरूप तय करें।

  • बच्चों पर व्रत का दबाव न डालें, यह पूरी तरह स्वैच्छिक परंपरा है।

  • यात्रा में हों तो पूजा का समय और सामग्री सीमित रखी जा सकती है, भावना ज्यादा जरूरी मानी जाती है।

  • पहली बार व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन का निर्जला व्रत रखने की जगह फलाहार से शुरुआत कर सकते हैं।

संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि — सुबह से रात तक स्टेप बाय स्टेप

नीचे दी गई विधि ज्यादातर घरों में अपनाई जाने वाली सामान्य परंपरा पर आधारित है। कुछ परिवारों और क्षेत्रों में इसमें छोटे बदलाव हो सकते हैं, इसलिए इसे एक मार्गदर्शक ढांचे की तरह देखें।

  1. सुबह स्नान और संकल्प: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और भगवान गणेश के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें।

  2. साफ जगह पर पूजा स्थान तैयार करें: चौकी पर लाल या पीले कपड़े के साथ गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  3. दिनभर उपवास: अपनी क्षमता अनुसार निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन में से कोई एक तरीका चुनें।

  4. शाम को दोबारा स्नान: सूर्यास्त के बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।

  5. गणेश पूजन करें: दूर्वा, लाल फूल, अक्षत, सिंदूर और मोदक या लड्डू का भोग चढ़ाएं। दीपक व धूप जलाएं।

  6. मंत्र जाप: "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का जितनी बार संभव हो जाप करें, कई घरों में 108 बार जाप की परंपरा है।

  7. व्रत कथा सुनें या पढ़ें: पूजा के अंत में उस महीने से जुड़ी संकष्टी कथा पढ़ें, इसके लिए नीचे दिया गया कथा वाला भाग देखें।

  8. चंद्रोदय का इंतजार करें: अपने शहर का सही चंद्रोदय समय चेक करें और उस समय तक पूजा स्थल पर बने रहें।

  9. चंद्रमा को अर्घ्य दें और व्रत का पारण करें: नीचे दी गई पारण विधि के अनुसार अर्घ्य देकर फल या प्रसाद से व्रत खोलें।

चंद्रोदय का समय ही सबसे बड़ी उलझन क्यों बनता है

संकष्टी चतुर्थी की खास बात यह है कि इसमें तिथि से ज्यादा अहमियत चंद्रोदय के समय को दी जाती है। यानी अगर आपके शहर में चतुर्थी तिथि शाम को शुरू हो और चांद रात 8 बजे के बाद दिखे, तो व्रत उसी दिन माना जाता है जिस दिन चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि चल रही हो।

चंद्रोदय का समय ही सबसे बड़ी उलझन क्यों बनता है

यही वजह है कि एक ही दिन अलग-अलग शहरों में चंद्रोदय का समय अलग होता है और कभी-कभी तारीख भी बदल जाती है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहरों के बीच सामान्य तौर पर 15 से 40 मिनट तक का अंतर देखा जाता है।

शहर

अनुमानित चंद्रोदय समय (29 सितंबर 2026)

दिल्ली

लगभग 7:44 PM

मुंबई / ठाणे

लगभग 8:13 PM

पुणे

लगभग 8:10 PM

कोलकाता

रात के आसपास, स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें

बेंगलुरु

रात के आसपास, स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें

कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों के लिए मैंने जिन स्रोतों की जांच की, उनमें एक जैसा भरोसेमंद आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए यहां अनुमानित समय देने की जगह आपको स्थानीय पंचांग देखने की सलाह दी गई है। यह पारदर्शिता जरूरी है, क्योंकि गलत समय पर व्रत खोलना खुद व्रती के लिए मानसिक तनाव का कारण बन सकता है।

अंगारकी चतुर्थी — मंगलवार वाली संकष्टी को खास क्यों माना जाता है

जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है। पारंपरिक मान्यता में मंगलवार को मंगल ग्रह और भगवान गणेश दोनों से जोड़कर देखा जाता है, और इस दिन की गई पूजा को कई भक्त विशेष फलदायी मानते हैं।

यह जरूर समझ लें कि यह एक धार्मिक-सांस्कृतिक विश्वास है, कोई वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं। साल 2026 में कुल तीन अंगारकी संकष्टी चतुर्थी आ रही हैं — जनवरी, मई और सितंबर में।

इनमें से 29 सितंबर 2026 वाली संकष्टी नजदीक है, इसलिए इस साल के बचे हुए महीनों में यह आखिरी अंगारकी चतुर्थी होगी।

पूजा में क्या चढ़ाएं और किन बातों का ध्यान रखें

पूजा सामग्री ज्यादातर घरों में आसानी से उपलब्ध चीजों से ही पूरी हो जाती है। नीचे दी गई सूची एक सामान्य ढांचा है, अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसमें बदलाव किया जा सकता है।

  • गणेश जी की मूर्ति या चित्र, साथ में चौकी और लाल/पीला कपड़ा

  • 21 जोड़ी दूर्वा घास (गणेश जी को विशेष प्रिय मानी जाती है)

  • लाल या पीले रंग के फूल, अक्षत, सिंदूर

  • मोदक या लड्डू का भोग

  • दीपक, धूप, कपूर

  • अर्घ्य के लिए तांबे या स्टील का पात्र और साफ जल

कुछ परिवारों में गणेश पूजा के दौरान तुलसी पत्ता न चढ़ाने की परंपरा भी बताई जाती है, हालांकि यह क्षेत्र और सम्प्रदाय के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, इसलिए इसे स्थानीय परंपरा मानकर ही अपनाएं।

संकष्टी चतुर्थी की कथा — पौराणिक मान्यता के अनुसार

संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा भगवान गणेश और कार्तिकेय की पृथ्वी परिक्रमा वाली कथा है। यह कथा धार्मिक ग्रंथों में वर्णित पौराणिक मान्यता है, इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में न समझें।

कथा के अनुसार एक बार देवता कई कठिनाइयों से घिरे और भगवान शिव के पास सहायता मांगने पहुंचे। शिव जी ने कार्तिकेय और गणेश जी से पूछा कि कठिनाई दूर करने के योग्य कौन है। 

और परीक्षा के तौर पर दोनों को पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा। कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर तुरंत निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके यह कहा कि माता-पिता के चरणों में ही सारे लोक समाए हुए हैं।

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इस बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर शिव जी ने गणेश जी को वरदान दिया कि जो कोई चतुर्थी के दिन उनकी पूजा करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके कष्ट कम होंगे।

यही कथा हर महीने अलग-अलग नामों (जैसे विघ्नराज, वक्रतुंड, गजानन आदि) के साथ पढ़ी-सुनाई जाती है, और हर महीने की कथा में थोड़ा अंतर भी देखा जाता है।

कुछ धार्मिक ग्रंथों जैसे भविष्य पुराण और नरसिंह पुराण में इस व्रत का उल्लेख मिलने की बात कही जाती है, हालांकि इसका सीधा शास्त्रीय संदर्भ आम पाठकों के लिए सत्यापित करना कठिन है, इसलिए इसे परंपरा से मिली मान्यता के रूप में ही स्वीकार करें।

पारण (व्रत खोलने) की सही विधि

व्रत का पारण यानी व्रत खोलना, संकष्टी चतुर्थी में एक तय क्रम से होता है। जल्दबाजी में इस क्रम को उल्टा करने से बचें।

  1. चंद्रोदय के तुरंत बाद, अगर घर की छत या खिड़की से चांद साफ दिखे तो वहां पहुंच जाएं।

  2. तांबे के पात्र में जल भरें, उसमें अक्षत और सफेद फूल डालें।

  3. चंद्रमा की दिशा में मुख करके धीरे-धीरे जल की धार गिराते हुए अर्घ्य दें।

  4. अर्घ्य देते समय "ॐ सोम सोमाय नमः" जैसे सरल मंत्र का जाप कई परिवारों में किया जाता है, आप अपनी परंपरा के अनुसार मंत्र चुन सकते हैं।

  5. अर्घ्य के बाद घर आकर गणेश जी को फिर एक बार प्रणाम करें।

  6. फल, मोदक या हल्के फलाहार से व्रत खोलें, भारी और तला-भुना भोजन तुरंत लेने से बचें।

क्या करें और क्या न करें — आम गलतियां

  • चंद्रोदय से पहले जल या भोजन लेने से बचें, अगर व्रत निर्जला रखा है।

  • अर्घ्य का पानी शरीर या पैरों पर न छिड़कें, इसे सिर्फ चंद्रमा की दिशा में गिराएं।

  • पूजा में इस्तेमाल हुई सामग्री दोबारा उपयोग न करें।

  • व्रत के दिन गुस्सा, झगड़ा या नकारात्मक बातों से जितना हो सके दूर रहें, यह मानसिक शांति के लिए भी बताया जाता है।

  • अगर तबीयत बिगड़े तो व्रत तुरंत तोड़ें और डॉक्टर से सलाह लें, आस्था से सेहत ज्यादा जरूरी है।

अगर बादल की वजह से चांद न दिखे तो क्या करें

यह सवाल हर बरसाती महीने में बहुत पूछा जाता है। जब आसमान में बादल हों और चांद साफ न दिखे, तो ज्यादातर परिवार तय चंद्रोदय समय बीत जाने के बाद ही अर्घ्य और पारण की रस्म पूरी करते हैं, चांद को सीधे देखे बिना भी।

यह व्यवस्था कई क्षेत्रों में परंपरागत रूप से मानी जाती है, हालांकि यह पूरी तरह पारिवारिक और क्षेत्रीय प्रथा पर निर्भर करती है, इसे सार्वभौमिक नियम न मानें।

अगर आपके परिवार में इस बारे में अलग परंपरा चली आ रही है, तो उसी का पालन करना बेहतर रहेगा।

साल 2026 की आने वाली कुछ संकष्टी चतुर्थी तिथियां

नीचे दी गई तारीखें और अनुमानित चंद्रोदय समय दिल्ली के लिए हैं, अलग शहर के लिए समय बदल सकता है।

महीना

तारीख

दिन

नाम

अनुमानित चंद्रोदय (दिल्ली)

सितंबर 2026

29 सितंबर

मंगलवार

विघ्नराज संकष्टी (अंगारकी)

लगभग 7:44 PM

अक्टूबर 2026

29 अक्टूबर

गुरुवार

वक्रतुंड संकष्टी

करवा चौथ के साथ, समय स्थानीय पंचांग से देखें

नवंबर 2026

27 नवंबर

शुक्रवार

गणाधिप संकष्टी

लगभग 6:39 PM

दिसंबर 2026

26 दिसंबर

शनिवार

अखुरथ संकष्टी

लगभग 7:22 PM

एक दिलचस्प बात यह है कि 29 अक्टूबर 2026 को संकष्टी चतुर्थी और करवा चौथ एक ही दिन पड़ रहे हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या संकष्टी चतुर्थी हर महीने एक ही तारीख को आती है?

नहीं। यह चंद्र तिथि पर आधारित है, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख हर महीने बदलती रहती है। सही तारीख जानने के लिए महीने का पंचांग देखना जरूरी है।

अगर व्रत के दिन घर में दूर्वा न मिले तो क्या करें?

दूर्वा न मिलने पर लाल फूल या तुलसी की जगह अक्षत और सिंदूर से भी पूजा पूरी की जा सकती है। सामग्री की कमी की वजह से व्रत अधूरा नहीं माना जाता, भावना और नियम का पालन ज्यादा जरूरी माना जाता है।

क्या दिन में पानी पीकर संकष्टी व्रत रखा जा सकता है?

हां। ज्यादातर परिवारों में फलाहार व्रत की छूट होती है, जिसमें दिन में पानी, दूध और फल लिए जा सकते हैं। पूरी तरह निर्जला व्रत रखना सबके लिए अनिवार्य नहीं है।

अगर एक दिन चंद्रोदय का समय बहुत रात का हो, तो क्या इंतजार जरूरी है?

पारंपरिक तरीके में हां, चंद्र दर्शन तक इंतजार किया जाता है। लेकिन बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति या छोटे बच्चों के लिए परिवार अक्सर समय में लचीलापन रखते हैं, यह हर घर की अपनी समझ पर निर्भर करता है।

संकष्टी चतुर्थी और सकट चौथ में क्या फर्क है?

सकट चौथ माघ महीने की संकष्टी चतुर्थी को ही उत्तर भारत में दिया गया नाम है, यह अलग व्रत नहीं बल्कि क्षेत्रीय नाम है।

निष्कर्ष

संकष्टी चतुर्थी व्रत की सबसे बड़ी सीख यही है कि इसमें कठोरता से ज्यादा नियम और समय की सही समझ जरूरी है। चंद्रोदय का समय अपने शहर के हिसाब से जरूर देखें, कथा और पूजा को शांति से पूरा करें, और सेहत को हमेशा पहली प्राथमिकता रखें।


संपादकीय और लेखक की जानकारी

यह लेख Choghadiyas.in की संपादकीय टीम द्वारा पंचांग और व्रत-संबंधी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध, प्रतिष्ठित स्रोतों की तुलना करके तैयार किया गया है। तारीख और चंद्रोदय समय जैसी जानकारी समय के साथ बदल सकती है, इसलिए प्रकाशन के बाद भी समय-समय पर इसकी समीक्षा की जाती है। किसी भी सुधार या सुझाव के लिए हमसे जुड़ सकते हैं।

संदर्भ स्रोत: पंचांग और चंद्रोदय की गणना पद्धति समझने के लिए DrikPanchang – Sankashti Chaturthi Vrat Dates देखा जा सकता है।

अस्वीकरण 

यह लेख केवल सामान्य जानकारी और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। इसमें दी गई पूजा विधि, कथा, मुहूर्त और चंद्रोदय समय क्षेत्र, परिवार और पंचांग स्रोत के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। किसी भी धार्मिक कार्य के लिए स्थानीय पंडित या अपने परिवार की परंपरा से भी सलाह लें। सेहत से जुड़े किसी भी फैसले (जैसे उपवास) से पहले चिकित्सक की सलाह लेना उचित रहेगा। यह लेख किसी भी प्रकार का चमत्कारी दावा या तुरंत परिणाम की गारंटी नहीं देता।

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Shiv Kumar Pandit

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मैं, शिव कुमार पंडित, इस प्लेटफ़ॉर्म का Co-Founder और वरिष्ठ कंटेंट रिसर्चर हूं। मुझे भारतीय संस्कृति, शुभ मुहूर्त, चोघड़िया, पंचांग और पारंपरिक ज्ञान से जुड़े विषयों पर रिसर्च करना और सरल भाषा में जानकारी साझा करना पसंद है, ताकि हर पाठक आसानी से सही जानकारी समझ सके।

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