कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार यह तिथि 21 नवंबर 2026 की रात से शुरू होकर 22 नवंबर 2026 की शाम तक रहेगी। इसलिए व्रत और पूजा का मुख्य दिन 22 नवंबर रहेगा।
एकादशी तिथि का सटीक समय
देव उठनी एकादशी आखिर है क्या?
यह वह दिन है जब मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा के बाद जागते हैं।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु सोते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी पर उठते हैं।
इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं। इस दौरान परंपरागत रूप से विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।
देव उठनी एकादशी के बाद से ये सभी मांगलिक कार्य फिर शुरू हो जाते हैं। इसीलिए यह पर्व हिंदू घरों में काफी उत्साह से मनाया जाता है।
शुभ मुहूर्त 2026
नोट: ये मुहूर्त उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार अनुमानित हैं। अपने स्थानीय पंचांग या पुजारी से एक बार पुष्टि कर लें।
पूजा विधि सही तरीके से कैसे करें?
देव उठनी एकादशी की पूजा में सरल तरीके से की जा सकती है। घर पर भी आसानी से की जा सकती है।
सुबह उठकर पहले करें:
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर के पूजा स्थान को साफ करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के आगे दीप जलाएं।
तुलसी के पौधे को साफ करके उसे भी सजाएं क्योंकि इस दिन तुलसी विवाह की परंपरा भी कई घरों में होती है।
पूजा की सामग्री:
तुलसी दल, पीले फूल, पीला कपड़ा, धूप, दीप, नैवेद्य के लिए मिठाई या फल, शंख, और विष्णु सहस्रनाम की पुस्तक। इन चीजों का उपयोग किया जाता है।
पूजा का क्रम:
पहले भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं। फिर वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद तुलसी दल और पीले फूल चढ़ाएं। धूप दीप जलाकर आरती करें। विष्णु सहस्रनाम या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
शाम की विशेष पूजा:
शाम को तुलसी के पास दीप जलाएं। तुलसी विवाह करने वाले घरों में इस समय शालिग्राम और तुलसी का विवाह संस्कार होता है। पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें।
व्रत के नियम क्या करें, क्या न करें
व्रत रखने वाले लोगों के लिए कुछ बातें ध्यान रखना जरूरी है।
करें:
दशमी तिथि यानी 21 नवंबर की शाम से ही सात्विक भोजन लें। एकादशी के दिन फलाहार या निराहार रहें।
भगवान विष्णु का स्मरण और पाठ करें। जरूरतमंदों को दान दें। शाम को तुलसी के पास दीप जलाएं।
न करें:
चावल, मांस, प्याज, लहसुन एकादशी पर परंपरागत रूप से नहीं खाए जाते। झूठ बोलने और क्रोध से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
दशमी की रात अधिक खाना उचित नहीं माना जाता। द्वादशी पर पारण किए बिना व्रत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए 23 नवंबर की सुबह तय समय पर व्रत खोलना जरूरी है।
तुलसी विवाह और देव उठनी एकादशी का संबंध
इन दोनों का करीबी संबंध है।
कई घरों में देव उठनी एकादशी पर ही तुलसी विवाह का आयोजन होता है।
शालिग्राम को विष्णु स्वरूप मानकर तुलसी के साथ विवाह संस्कार किया जाता है। गन्ना, सिंघाड़ा, आंवला और फूलों से तुलसी के चारों ओर मंडप सजाया जाता है।
कई परिवारों में यह छोटे बच्चों के लिए भी यादगार अनुभव होता है। पूरे घर में उत्सव का माहौल रहता है।
कुछ परिवार तुलसी विवाह कार्तिक पूर्णिमा पर करते हैं। इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार तय करें।
देव उठनी एकादशी पर कौन से शुभ काम शुरू होते हैं?
चातुर्मास खत्म होते ही जिन कामों पर रोक होती है वे सब फिर शुरू हो जाते हैं।
विवाह के मुहूर्त इसी दिन के बाद से निकाले जाते हैं।
गृह प्रवेश, नई दुकान का उद्घाटन, नई गाड़ी खरीदना, मुंडन संस्कार जैसे काम भी इसके बाद से शुभ कार्यों के रूप में देखे जाते हैं।
इसीलिए नवंबर के बाद शादी के सीजन की शुरुआत होती है और दिसंबर तक विवाह के कार्यक्रम चलते रहते हैं।
पारण कैसे और कब करें?
व्रत खोलना यानी पारण करना भी उतना ही जरूरी है जितना व्रत रखना।
23 नवंबर 2026 को सुबह 06:48 बजे के बाद पारण करें। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले यानी 08:52 बजे से पहले पारण हो जाना चाहिए।
पहले थोड़ा जल पिएं, फिर तुलसी दल ग्रहण करें और उसके बाद सामान्य भोजन लें।
राहुकाल में पारण न करें। 23 नवंबर को राहुकाल सोमवार के अनुसार सुबह 07:30 से 09:00 के बीच हो सकता है इसलिए सुबह जल्दी पारण कर लेना बेहतर रहेगा।
इस एकादशी का महत्व इतना क्यों है?
साल में 24 एकाएकादशियाँ हैं। पर देव उठनी एकादशी की बात अलग है।
यह वर्ष की काफी महत्त्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है क्योंकि इसके बाद मांगलिक जीवन फिर से सक्रिय होता है।
पद्म पुराण में इस एकादशी की विशेष महिमा का उल्लेख मिलता है। कई मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत और पूजा करने से विशेष धार्मिक महत्त्व मिलता है।
यह मान्यताओं पर आधारित है। पर व्यावहारिक रूप से, यह है कि यह पर्व परिवारों को एक साथ लाता है। घर में उत्सव का माहौल बनता है।
घर पर आसान तुलसी विवाह कैसे करें?
तुलसी विवाह के लिए किसी बड़े आयोजन की जरूरत नहीं होती।
घर के आंगन या बालकनी में तुलसी के पौधे के पास शालिग्राम रखें। गन्ने के टुकड़े चारों तरफ लगाएं।
तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाएं और शालिग्राम को पीले वस्त्र। घी का दीपक जलाएं और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करते हुए तुलसी की 7 परिक्रमाएं करें।
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प्रसाद में मिठाई, आंवला और सिंघाड़ा चढ़ाएं। बाद में परिवार में बांट दें। यह पूजा सरल तरीके से की जा सकती है।
2026 में विवाह मुहूर्त कब से शुरू होंगे?
देव उठनी एकादशी के बाद यानी 22 नवंबर 2026 के बाद से शुभ विवाह मुहूर्त निकलने लगेंगे।
नवंबर के अंत और दिसंबर 2026 में कई विवाह मुहूर्त पड़ने की संभावना है।
विस्तृत मुहूर्त सूची के लिए किसी विश्वसनीय पंचांग या ज्योतिषी से परामर्श लें। drikpanchang.com पर भी पंचांग आधारित जानकारी उपलब्ध होती है।
जरूरी बातें जो अक्सर लोग भूल जाते हैं
कुछ छोटी चीजें हैं जो व्रत और पूजा को पूरा करती हैं।
दशमी की रात नमक कम खाएं और भारी भोजन से बचें।
एकादशी की सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करना पारंपरिक रूप से उपयुक्त माना जाता है।
पूरे दिन मन शांत रखें और झगड़ों से दूर रहें। रात को जागरण कर सकते हैं। भगवान के भजन और कीर्तन का वातावरण बनाएं।
बीमार व्यक्ति, बच्चे, और बुजुर्ग अपनी शक्ति के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। व्रत की सख्ती से अधिक भावना का महत्व होता है।
प्रसाद में क्या बनाएं?
इस दिन घरों में खास प्रसाद तैयार होता है।
पंजीरी, मिश्री, आंवले का मुरब्बा, सिंघाड़े का आटा, और साबूदाने की खिचड़ी इस दिन के आम तौर पर बनाए जाने वाले व्यंजन हैं।
तुलसी विवाह के बाद पंचामृत का प्रसाद भी बांटा जाता है। कुछ लोग मखाने और मूंगफली भी रखते हैं।
बस यह ध्यान रखें कि प्रसाद में प्याज, लहसुन, नमक न हो।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
देव उठनी एकादशी 2026 में किस दिन है?
22 नवंबर 2026 को रविवार के दिन देव उठनी एकादशी मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 21 नवंबर की रात शुरू होकर 22 नवंबर की रात तक रहेगी।
व्रत का पारण कब करना चाहिए?
23 नवंबर 2026 को सुबह 06:48 बजे के बाद और 08:52 बजे से पहले पारण करना उचित माना जाता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण करना जरूरी है।
क्या देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह एक ही दिन होते हैं?
हां, कई परिवारों में देव उठनी एकादशी पर ही तुलसी विवाह किया जाता है। कुछ परंपराओं में यह कार्तिक पूर्णिमा को भी होता है। यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है।
चातुर्मास में कौन से काम नहीं होते?
आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार महीनों में परंपरागत रूप से विवाह, गृह प्रवेश, और कुछ अन्य मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते। देव उठनी एकादशी के बाद ये सब फिर शुरू हो जाते हैं।
क्या बीमार व्यक्ति भी यह व्रत रख सकते हैं?
बीमार, बुजुर्ग, और छोटे बच्चे अपनी शक्ति के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। व्रत की सख्ती से ज्यादा श्रद्धा और भाव को महत्व दिया जाता है।
अधिक जानकारी के लिए
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अस्वीकरण: यह लेख पारंपरिक मान्यताओं, सांस्कृतिक प्रथाओं और पंचांग आधारित जानकारी पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी और शैक्षिक उपयोग है। तिथियों, मुहूर्त और पूजा विधि की पुष्टि के लिए अपने स्थानीय पंचांग या अनुभवी पुजारी से मार्गदर्शन लेना उपयुक्त माना जाता है।
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