Tulsi Puja Kab Hai 2026 Mein Aur Kiy Manaya Jata Hai, यह सवाल हर हिंदू परिवार के मन में कार्तिक मास आते ही उठता है।
हर घर के आंगन में एक तुलसी का पौधा होता है।
सुबह उठकर उसे जल चढ़ाना, दीपक जलाना, प्रदक्षिणा करना — यह दिनचर्या कई परिवारों में आज भी प्रचलित है।
पर साल में एक दिन ऐसा आता है जब तुलसी की पूजा साधारण नहीं रहती।
उस दिन तुलसी माता को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, मंडप बनाया जाता है और पूरे विधि-विधान से विवाह संपन्न होता है।
उसी दिन को तुलसी विवाह या तुलसी पूजा कहते हैं।
सीधा जवाब तुलसी पूजा 2026 कब है
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| तुलसी विवाह तिथि 2026 | शनिवार, 21 नवंबर 2026 |
| हिंदू पंचांग तिथि | कार्तिक शुक्ल द्वादशी |
| द्वादशी तिथि आरंभ | 21 नवंबर 2026 को प्रातः 06:31 बजे |
| द्वादशी तिथि समाप्त | 22 नवंबर 2026 को प्रातः 04:56 बजे |
| पूजा का शुभ समय (प्रदोष काल) | सायं 05:25 बजे से 07:49 बजे तक (नई दिल्ली) |
| मास | कार्तिक (शुक्ल पक्ष) |
| वार | शनिवार |
यह जानकारी पंचांग स्रोतों की सहायता से तैयार की गई है।
स्थान के अनुसार समय में अंतर संभव है।
तुलसी पूजा 2026 संक्षिप्त उत्तर
तुलसी पूजा 2026 में 21 नवंबर, शनिवार को मनाई जाएगी। यह कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि को पड़ती है। द्वादशी तिथि 21 नवंबर को प्रातः 06:31 बजे आरंभ होती है। पूजा का शुभ मुहूर्त प्रदोष काल में सायं 05:25 से 07:49 बजे तक माना जाता है। इसे तुलसी विवाह भी कहते हैं।
तुलसी विवाह 2026 तिथि और पंचांग विवरण
| पंचांग अंग | विवरण |
|---|---|
| तिथि | कार्तिक शुक्ल द्वादशी (12वाँ दिन) |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| मास | कार्तिक |
| द्वादशी तिथि प्रारंभ | 21 नवंबर 2026, प्रातः 06:31 बजे |
| द्वादशी तिथि समाप्ति | 22 नवंबर 2026, प्रातः 04:56 बजे |
| प्रदोष काल (शुभ पूजा समय) | सायं 05:25 बजे से 07:49 बजे तक |
| पूर्ववर्ती दिन (एकादशी) | प्रबोधिनी एकादशी — 20 नवंबर 2026 |
| उत्तरवर्ती पर्व | कार्तिक पूर्णिमा — 26 नवंबर 2026 |
यह पंचांग गणना भारतीय मानक समय (IST) पर आधारित है।
शहर के अनुसार सूर्यास्त और प्रदोष काल में थोड़ा अंतर आ सकता है।
तुलसी विवाह क्या होता है और कब मनाया जाता है
तुलसी विवाह वह पर्व है जिसमें तुलसी माता का विवाह शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु से कराया जाता है।
यह हर वर्ष कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाया जाता है।
कई परंपराओं में यह पर्व प्रबोधिनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाता है।
कुछ क्षेत्रों में पाँच दिनों तक यह उत्सव चलता है।
पर सबसे प्रचलित दिन द्वादशी ही है। इसी दिन मुख्य पूजा और विवाह संस्कार संपन्न होते हैं।
तुलसी का पौराणिक परिचय वृंदा से तुलसी तक की कथा
तुलसी माता की कथा पद्म पुराण में विस्तार से मिलती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी माता पहले वृंदा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थीं।
वृंदा का विवाह जलंधर नामक असुर राजा से हुआ था।
वृंदा की पतिव्रता शक्ति के कारण जलंधर अजेय हो गया था।
देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने जलंधर का वध करना चाहा, पर वह संभव नहीं था।
तब भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धरकर वृंदा का पतिव्रत भंग किया।
इसके बाद जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और शिव ने उसका वध कर दिया।
सच्चाई जानने पर वृंदा ने विष्णु को श्राप दिया और स्वयं को समर्पित कर दिया।
भगवान विष्णु और अन्य देवताओं ने वृंदा की आत्मा को एक पौधे में स्थापित किया, जो तुलसी कहलाया।
इसी वचन के अनुसार, भगवान विष्णु ने शालिग्राम रूप में अगले जन्म में तुलसी से विवाह किया।
यह विवाह प्रबोधिनी एकादशी के दिन हुआ, जिसकी स्मृति में तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाता है।
तुलसी विवाह क्यों मनाया जाता है धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
तुलसी विवाह का महत्व केवल एक पूजा तक सीमित नहीं है।
यह पर्व कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है।
धार्मिक महत्व के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- कई परंपराओं में माना जाता है कि इस दिन तुलसी का कन्यादान करने से कन्यादान के समान महत्व से जोड़कर देखा जाता है।
- जो परिवार पुत्री-विहीन हैं, उनके लिए तुलसी का विवाह कराना संस्कारों में विशेष स्थान रखता है।
- चातुर्मास की समाप्ति के बाद यह एक महत्वपूर्ण मांगलिक अवसर माना जाता है।
- परंपरागत रूप से माना जाता है कि तुलसी का पौधा
- पद्म पुराण में इस अवसर का विशेष उल्लेख मिलता है।
चातुर्मास का अंत और विवाह मुहूर्त का आरंभ
हिंदू धर्म में आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं।
यह काल चातुर्मास कहलाता है — चार महीनों का वह समय जब शुभ विवाह आदि कार्य नहीं होते।
कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी कहते हैं।
अगले दिन यानी द्वादशी को तुलसी विवाह संपन्न होता है।
इस दिन के बाद से शादी-विवाह के मुहूर्त फिर से निकलने लगते हैं।
यही कारण है कि तुलसी विवाह को हिंदू विवाह सीजन का आधिकारिक आरंभ भी माना जाता है।
कई परिवारों में यह परंपरा है कि जब तक तुलसी विवाह न हो, घर में विवाह की तिथि नहीं तय की जाती।
तुलसी पूजा की सामग्री सूची
तुलसी विवाह के लिए जो सामग्री पारंपरिक रूप से उपयोग होती है, वह इस प्रकार है।
- तुलसी का पौधा (तीन या अधिक वर्ष पुराना हो तो बेहतर माना जाता है)
- शालिग्राम शिला या भगवान विष्णु की पीतल की प्रतिमा
- लाल चुनरी या साड़ी
- बिंदी, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ (तुलसी माता के श्रृंगार के लिए)
- गन्ने की लाठी (मंडप बनाने के लिए)
- आँवला और इमली की शाखाएँ
- हल्दी, कुमकुम, अक्षत
- पीला धागा (वरमाला एवं गठबंधन के लिए)
- दीपक, धूपबत्ती, फल, मिठाई
- शकरकंद, आँवला, इमली (विशेष भोग प्रसाद)
तुलसी पूजा विधि घर पर कैसे करें
घर में तुलसी विवाह करना कठिन नहीं है।
परंपरागत पद्धति में यह विवाह शाम को संपन्न होता है।
पूजा विधि के प्रमुख चरण इस प्रकार हैं:
- सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- तुलसी के पौधे और शालिग्राम दोनों को स्नान कराएँ।
- गन्ने की लाठियों से तुलसी के चारों ओर मंडप तैयार करें।
- रंगोली बनाएँ और फूलों से सजावट करें।
- तुलसी माता को लाल चुनरी ओढ़ाएँ, बिंदी, चूड़ियाँ और अन्य श्रृंगार करें।
- शालिग्राम जी को पीले वस्त्र पहनाएँ।
- पीले धागे से तुलसी और शालिग्राम को साथ बाँधें।
- मंत्रोच्चारण के साथ सात परिक्रमाएँ करें।
- हल्दी और कुमकुम अर्पित करें।
- आरती गाएँ और प्रसाद वितरण करें।
प्रदोष काल में पूजा की परंपरा प्रचलित है।
विवाह की रस्में रात्रि से पहले पूरी कर लेना उचित रहता है।
तुलसी विवाह 2026 क्षेत्रीय परंपराएँ
भारत में तुलसी विवाह की तिथि और विधि क्षेत्र के अनुसार थोड़ी भिन्न होती है।
कुछ क्षेत्रों में एकादशी को ही यह पूजा होती है।
कुछ जगहों पर द्वादशी मुख्य दिन होता है।
महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में तुलसी विवाह विशेष धूमधाम से मनाया जाता है।
सौराष्ट्र के राम मंदिरों में इस अवसर पर भव्य बारात निकाली जाती है।
वधू के मंदिर से वर के मंदिर को विवाह का निमंत्रण भेजा जाता है।
नृत्य और भजन के साथ भव्य शोभायात्रा निकलती है।
हर राज्य में तुलसी विवाह की भावना एक है, पर रीतियाँ अपनी-अपनी हैं।
तुलसी पूजा दिवस 25 दिसंबर 2026
तुलसी पूजा दिवस एक अलग और अपेक्षाकृत नई परंपरा है।
यह 25 दिसंबर को मनाया जाता है।
इसे लगभग 2014 के आसपास एक भारतीय धार्मिक आंदोलन द्वारा प्रारंभ किया गया था।
इस दिन तुलसी के पौधे लगाए जाते हैं, उनकी सेवा की जाती है और पारंपरिक पूजा की जाती है।
यह तुलसी विवाह से भिन्न है।
तुलसी विवाह पंचांग-आधारित पारंपरिक पर्व है जबकि तुलसी पूजा दिवस ग्रेगोरियन कैलेंडर की तिथि पर मनाया जाता है।
तुलसी के पौधे का सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्व
तुलसी का पौधा केवल धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
हिंदू मान्यताओं में तुलसी को देवी लक्ष्मी का अवतार कहा गया है।
भगवान विष्णु और तुलसी का संबंध पारंपरिक ग्रंथों में विशेष रूप से वर्णित मिलता है।
आयुर्वेद में तुलसी को "ओसिमम सैंक्टम" कहते हैं।
यह पौधा भारतीय उपमहाद्वीप का मूल निवासी है।
पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका उल्लेख सदियों से मिलता है।
घर के आंगन में तुलसी का वृंदावन होना परिवार की आस्था और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है।
तुलसी विवाह की विशेष परंपराएँ जो कम जानते हैं
ज्यादातर लोग बड़े आयोजनों के बारे में जानते हैं।
पर तुलसी विवाह से जुड़ी कुछ बातें कम चर्चित हैं।
- कन्यादान की भावना जिन परिवारों में बेटी नहीं है, वे तुलसी का कन्यादान कर इस संस्कार को निभाते हैं।
- मंगल अष्टक विवाह संस्कार के दौरान मंगल अष्टक मंत्रों का पाठ किया जाता है।
- तुलसी दल ग्रहण कुछ परंपराओं में पूजा के बाद तुलसी का एक पत्ता प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
- भोग की सामग्री शकरकंद, आँवला, इमली और नारियल का भोग अर्पित करने की परंपरा है।
- वर-माला शालिग्राम और तुलसी दोनों को वरमाला पहनाई जाती है।
कई परिवारों में पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है।
गाँव में अभी भी पूरा मोहल्ला मिलकर तुलसी विवाह करता है।
तुलसी विवाह कार्तिक मास के पर्वों की श्रृंखला में
तुलसी विवाह अकेला नहीं है।
यह कार्तिक मास की एक पूरी पर्व श्रृंखला का हिस्सा है।
| पर्व / तिथि | 2026 में तारीख |
|---|---|
| प्रबोधिनी एकादशी (देवउठनी एकादशी) | 20 नवंबर 2026 (शुक्रवार) |
| तुलसी विवाह (द्वादशी) | 21 नवंबर 2026 (शनिवार) |
| कार्तिक पूर्णिमा / देव दीपावली | 26 नवंबर 2026 |
एकादशी पर विष्णु जागते हैं।
द्वादशी पर तुलसी विवाह होता है।
पूर्णिमा पर देव दीपावली का महोत्सव।
यह पूरा सप्ताह कार्तिक मास का सबसे आस्थापूर्ण समय होता है।
किन बातों का ध्यान रखे व्रत और पूजा के नियम
तुलसी विवाह के दिन कुछ परंपराएँ विशेष रूप से निभाई जाती हैं।
- कई परंपराओं में व्रत का समापन पूजा के बाद किया जाता है।
- व्रत शाम को पूजा संपन्न होने के बाद खोला जाता है।
- कुछ परिवारों में महिलाएँ उपवास रखने की परंपरा निभाती हैं।
- कई परंपराओं में विवाह संस्कार प्रदोष काल में संपन्न किए जाते हैं।
- विवाह के सभी संस्कार पारंपरिक हिंदू विवाह जैसे होते हैं।
- तिथि हर वर्ष पंचांग गणना के अनुसार बदलती है।
पूजा के बाद प्रसाद में फल, मिठाई, नारियल और शकरकंद वितरित किया जाता है।
FAQ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तुलसी विवाह 2026 में किस दिन है?
तुलसी विवाह 2026 में शनिवार, 21 नवंबर को मनाया जाएगा। यह कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि है। द्वादशी तिथि 21 नवंबर को प्रातः 06:31 बजे शुरू होती है और 22 नवंबर को प्रातः 04:56 बजे समाप्त होती है। पूजा का मुख्य मुहूर्त प्रदोष काल में सायं 05:25 से 07:49 बजे के बीच माना जाता है।
तुलसी विवाह और तुलसी पूजा दिवस में क्या अंतर है?
तुलसी विवाह एक प्राचीन हिंदू पर्व है जो कार्तिक शुक्ल द्वादशी को पंचांग के अनुसार मनाया जाता है। इसमें तुलसी माता का शालिग्राम से विवाह संस्कार होता है। तुलसी पूजा दिवस एक अपेक्षाकृत नई परंपरा है जो हर वर्ष 25 दिसंबर को ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार मनाई जाती है।
तुलसी विवाह किस तिथि को मनाया जाता है?
परंपरागत रूप से यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में एकादशी भी मुख्य दिन होती है। पाँच दिनों का उत्सव कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। तिथि हर वर्ष बदलती है इसलिए पंचांग देखना उचित होता है।
क्या तुलसी विवाह घर पर किया जा सकता है?
हाँ, तुलसी विवाह घर पर पूरी श्रद्धा से किया जा सकता है। यह पूजा विभिन्न परिवारों में अलग-अलग तरीकों से संपन्न की जाती है। परिवार की महिलाएँ मिलकर यह पूजा संपन्न कर सकती हैं। मंडप, सामग्री और विधि सरल है और इसे कोई भी श्रद्धालु घर पर कर सकता है।
तुलसी विवाह में पूजा का सबसे शुभ समय कौन सा है?
पारंपरिक रूप से प्रदोष काल, यानी सूर्यास्त के बाद का समय, तुलसी विवाह के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। समय स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
विवाह संस्कार मध्यरात्रि से पहले पूरे कर लेना उचित माना जाता है।
निष्कर्ष
तुलसी पूजा 2026 में 21 नवंबर, शनिवार को है।
यह कार्तिक शुक्ल द्वादशी का वह विशेष दिन है जब भारत के लाखों घरों में तुलसी माता की पूरे विवाह संस्कार के साथ पूजा होती है।
यह पर्व चातुर्मास की समाप्ति का संकेत है, विवाह मुहूर्त के आरंभ की घोषणा है और एक पवित्र पौराणिक कथा की स्मृति है।
स्थान के अनुसार समय में अंतर संभव है।
स्थानीय गणना में थोड़ा अंतर हो सकता है।
यह जानकारी पंचांग गणनाओं और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है।
अस्वीकरण: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और सांस्कृतिक संदर्भ के लिए है। इसमें दी गई तिथियाँ और समय पारंपरिक पंचांग पद्धति पर आधारित हैं। धार्मिक जानकारी को पारंपरिक मान्यताओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि किसी फलादेश या गारंटी के रूप में।
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