तिथि यानी चंद्रमा और सूर्य के बीच की कोणीय दूरी से बनने वाला एक समयखंड।
जब चंद्रमा सूर्य से १२ अंश आगे बढ़ता है, तो एक तिथि पूरी होती है।
यह गणना पारंपरिक खगोलीय गणनाओं पर आधारित मानी जाती है।
सरल भाषा में कहें तो तिथि एक दिन की तरह होती है, पर यह घड़ी के हिसाब से नहीं बदलती।
चंद्रमा की गति के हिसाब से बदलती है।
इसीलिए कभी एक तिथि करीब १९ घंटे की होती है, तो कभी २६ घंटे की भी हो जाती है।
एक महीने में कितनी तिथियाँ होती हैं?
हिंदू मास में कुल ३० तिथियाँ होती हैं। यह ३० तिथियाँ दो पक्षों में बँटी होती हैं।
शुक्ल पक्ष यानी अमावस्या के बाद का वह समय जब चंद्रमा बढ़ता है। इसमें प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ तिथियाँ आती हैं।
कृष्ण पक्ष यानी पूर्णिमा के बाद का वह समय जब चंद्रमा घटता है। इसमें भी प्रतिपदा से अमावस्या तक १५ तिथियाँ होती हैं।
तिथियों के नाम क्या हैं?
शुक्ल पक्ष की तिथियाँ
| तिथि | विवरण |
|---|---|
| प्रतिपदा (१) | पहली तिथि |
| द्वितीया (२) | दूसरी तिथि |
| तृतीया (३) | तीसरी तिथि |
| चतुर्थी (४) | चौथी तिथि |
| पञ्चमी (५) | पाँचवीं तिथि |
| षष्ठी (६) | छठी तिथि |
| सप्तमी (७) | सातवीं तिथि |
| अष्टमी (८) | आठवीं तिथि |
शुक्ल पक्ष की आगे की तिथियाँ
| तिथि | विवरण |
|---|---|
| नवमी (९) | नौवीं तिथि |
| दशमी (१०) | दसवीं तिथि |
| एकादशी (११) | ग्यारहवीं तिथि |
| द्वादशी (१२) | बारहवीं तिथि |
| त्रयोदशी (१३) | तेरहवीं तिथि |
| चतुर्दशी (१४) | चौदहवीं तिथि |
| पूर्णिमा (१५) | पंद्रहवीं तिथि |
| अमावस्या (१५) | कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि |
तिथियों को किन श्रेणियों में बाँटा गया है?
प्रमुख तिथि वर्ग
| श्रेणी | तिथियाँ |
|---|---|
| नंदा तिथि | प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी |
| भद्रा तिथि | द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी |
| जया तिथि | तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी |
अन्य तिथि वर्ग
| श्रेणी | तिथियाँ |
|---|---|
| रिक्ता तिथि | चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी |
| पूर्णा तिथि | पञ्चमी, दशमी, पूर्णिमा और अमावस्या |
शुभ तिथियाँ कौन सी मानी जाती हैं?
| तिथि | मान्यता |
|---|---|
| द्वितीया | नए काम के लिए उपयुक्त |
| तृतीया | विवाह मुहूर्त में उपयोगी |
| पञ्चमी | शिक्षा और विद्या आरंभ |
| सप्तमी | यात्रा के लिए उपयुक्त |
धार्मिक और शुभ कार्य
| तिथि | मान्यता |
|---|---|
| दशमी | व्यापार के लिए उपयुक्त |
| एकादशी | व्रत और पूजा के लिए विशेष |
| द्वादशी | दान और धार्मिक कार्य |
| पूर्णिमा | धार्मिक कार्यों के लिए विशेष |
कई पंडित और ज्योतिषी तृतीया को विवाह के लिए और पञ्चमी को विद्यारंभ के लिए काफी उपयुक्त मानते हैं। यह मान्यता पारंपरिक है और अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़ी भिन्न हो सकती है।
अशुभ मानी जाने वाली तिथियाँ कौन सी हैं?
| तिथि | मान्यता |
|---|---|
| चतुर्थी | नए कार्य में विलंब माना जाता है |
| नवमी | रिक्ता श्रेणी में आती है |
| चतुर्दशी | मांगलिक कार्यों से बचा जाता है |
| अमावस्या | पितृ कार्यों के लिए विशेष, शुभ कार्य कम |
तिथि और शादी का मुहूर्त
भारत में विवाह के लिए मुहूर्त निकालते समय सबसे पहले तिथि देखी जाती है।
ज्यादातर परिवारों में पंडित से पंचांग मँगाया जाता है। फिर वार, नक्षत्र और तिथि का मिलान किया जाता है।
आमतौर पर द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी और एकादशी को विवाह के लिए अनुकूल माना जाता है।
शुक्ल पक्ष की तिथियाँ आमतौर पर ज्यादा पसंद की जाती हैं।
अमावस्या और चतुर्दशी पर विवाह करने से अधिकांश परिवार बचते हैं।
यह उनकी पारिवारिक परंपरा और मान्यता पर निर्भर करता है।
एकादशी तिथि का विशेष महत्व
एकादशी शायद सबसे ज़्यादा मानी जाने वाली तिथि है। हर महीने दो एकादशियाँ आती हैं।
एक शुक्ल पक्ष में, एक कृष्ण पक्ष में।
वैष्णव परिवारों में एकादशी का व्रत रखना एक पुरानी परंपरा है।
बहुत से लोग इस दिन अनाज नहीं खाते। फल, दूध और जल पर रहते हैं।
पंचांग के अनुसार एकादशी की जानकारी drikpanchang.com जैसे विश्वसनीय स्रोतों पर आसानी से मिलती है।
पूर्णिमा और अमावस्या की विशेषता
पूर्णिमा यानी जब चंद्रमा पूरी तरह गोल दिखता है। इस दिन चंद्रमा और सूर्य एक-दूसरे के सामने होते हैं, लगभग १८० अंश पर।
पूर्णिमा को सत्यनारायण व्रत, बुद्ध पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा और करवाचौथ जैसे त्योहार आते हैं।
अमावस्या यानी जब चंद्रमा बिल्कुल नहीं दिखता। इस दिन पितृ तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कार्य किए जाते हैं।
हिंदू परंपरा में इस दिन पूर्वजों का स्मरण किया जाता है।
क्षय तिथि और वृद्धि तिथि क्या होती हैं?
ये दो शब्द पंचांग में कभी-कभी दिखते हैं। बहुत से लोग इनसे परिचित नहीं होते।
क्षय तिथि यानी वह तिथि जो एक पूरे सूर्योदय चक्र में कहीं आती ही नहीं।
चंद्रमा की गति कभी-कभी इतनी तेज़ होती है कि एक तिथि महज कुछ घंटों में खत्म हो जाती है और सूर्योदय के समय उसका अस्तित्व नहीं रहता।
वृद्धि तिथि इसका उलटा है। जब एक ही तिथि लगातार दो सूर्योदयों तक चलती रहती है। इसे कहीं-कहीं अतिरिक्त तिथि भी कहते हैं।
यह खगोलीय कारणों से होता है। चंद्रमा की गति स्थिर नहीं है।
तिथि का दैनिक जीवन में उपयोग
सोचिए, घर में कोई नया सामान खरीदना हो, व्यापार शुरू करना हो या घर में गृह प्रवेश करना हो।
बहुत से परिवार इन सबके लिए पंचांग खोलते हैं। तिथि देखते हैं।
यह परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं है। यह एक तरह की सांस्कृतिक समझ है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। दादी-नानी के ज़माने से।
कुछ लोग इसे पूरी तरह मानते हैं। कुछ लोग इसे संदर्भ के तौर पर देखते हैं।
और कुछ इसे बिल्कुल नहीं मानते। तीनों के अपने-अपने कारण हैं।
हर तिथि का एक देवता और एक ग्रह
पारंपरिक ज्योतिष में हर तिथि को एक देवता और कभी-कभी एक ग्रह से जोड़ा जाता है।
तिथि और उनके संबंधित देवता (पारंपरिक मान्यता)
| तिथि | संबंधित देवता |
|---|---|
| प्रतिपदा | अग्नि देव |
| द्वितीया | ब्रह्मा जी |
| तृतीया | गौरी (पार्वती) |
| चतुर्थी | गणेश जी |
| पञ्चमी | सर्प देव / नागपंचमी |
| षष्ठी | कार्तिकेय / षष्ठी माता |
| सप्तमी | सूर्य देव |
| अष्टमी | शिव जी / दुर्गा माँ |
नवमी से अमावस्या तक
| तिथि | संबंधित देवता |
|---|---|
| नवमी | दुर्गा / राम नवमी |
| दशमी | यम देव / विजयादशमी |
| एकादशी | विष्णु जी |
| द्वादशी | विष्णु जी |
| त्रयोदशी | कामदेव / प्रदोष |
| चतुर्दशी | शिव जी / काली माँ |
| पूर्णिमा / अमावस्या | चंद्र देव / पितृ देव |
तिथि और त्योहारों का सीधा संबंध
भारत के लगभग सभी बड़े त्योहार किसी न किसी तिथि से जुड़े हैं।
दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आती है। होली फाल्गुन पूर्णिमा को।
जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को। राम नवमी चैत्र शुक्ल नवमी को।
यानी त्योहारों का पूरा कैलेंडर तिथियों पर टिका है। अगर तिथि का ज्ञान हो, तो पंचांग खुद-ब-खुद समझ आने लगता है।
भारतीय पंचांग प्रणाली के बारे में अधिक जानकारी के लिए Wikipedia पर हिंदू पंचांग लेख एक अच्छा संदर्भ है।
तिथि देखने का सबसे सरल तरीका
आजकल तिथि जानना बेहद आसान है। मोबाइल पर पंचांग ऐप्स मिलते हैं।
गूगल पर "आज की तिथि" टाइप करने पर तुरंत जवाब मिलता है।
पर सबसे भरोसेमंद तरीका है कागज़ का पंचांग। खासकर वे जो हर साल स्थानीय पंडित या दुकानों पर मिलते हैं।
इनमें स्थान के अनुसार सूर्योदय का समय और तिथि का सटीक विवरण होता है।
शहर के हिसाब से तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय बदलता है क्योंकि यह सूर्योदय पर निर्भर है।
क्या तिथि का असर सच में होता है?
यह सवाल बहुत से लोगों के मन में आता है।
ईमानदारी से कहूँ तो इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि किसी खास तिथि पर काम करने से नतीजा बेहतर होता है।
यह पूरी तरह आस्था और परंपरा पर आधारित है।
कई लोग इसे अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं। करोड़ों लोग सदियों से इसे मानते आए हैं।
यह उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। किसी के विश्वास को कमज़ोर आँकना सही नहीं।
तिथि एक व्यवस्था है। समय को समझने और जीवन में एक लय लाने की कोशिश।
यह परंपरा समय और जीवन को व्यवस्थित रूप से समझने का एक पारंपरिक तरीका मानी जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तिथि और तारीख में क्या फर्क है?
तारीख सूर्य की गति पर आधारित अंग्रेजी कैलेंडर का हिस्सा है जो हर दिन ठीक मध्यरात्रि पर बदलती है।
तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोण पर आधारित है और यह किसी भी समय बदल सकती है। इसीलिए एक ही दिन में दो तिथियाँ भी हो सकती हैं।
क्या अमावस्या पर कोई काम शुरू नहीं करना चाहिए?
पारंपरिक मान्यता में कई लोग अमावस्या पर नए कार्य, विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों से बचते हैं। पर यह पूरी तरह व्यक्ति और परिवार की आस्था पर निर्भर है। कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है।
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में कौन सा बेहतर माना जाता है?
आमतौर पर शुक्ल पक्ष को शुभ कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इसमें चंद्रमा बढ़ता है। कृष्ण पक्ष को पितृ कार्यों, श्राद्ध और आध्यात्मिक साधना के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह पारंपरिक समझ है।
एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
वैष्णव परंपरा में एकादशी को विष्णु जी की विशेष तिथि माना जाता है। इस दिन व्रत रखने से कई लोग इसे मानसिक अनुशासन और धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं, ऐसा कई लोग मानते हैं। यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है।
तिथि की गणना कैसे होती है?
जब चंद्रमा सूर्य से ठीक १२ अंश की दूरी तय करता है, तो एक तिथि पूरी होती है। पारंपरिक गणना-पद्धति में पूरे चंद्र चक्र को ३० तिथियों में विभाजित किया जाता है इसकी गणना खगोलीय है और पंचांग में इसे पारंपरिक पंचांगों में विस्तार से दर्ज किया जाता है।
अस्वीकरण: यह लेख पारंपरिक मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं और सामान्य जानकारी पर आधारित है। इसे केवल शैक्षणिक और सूचनात्मक उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय के लिए किसी योग्य ज्योतिषी या विद्वान से परामर्श लेना उचित रहेगा।
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